Kanker News: शिक्षक दिवस पर जब देशभर में शिक्षक अपने समर्पण और योगदान के लिए सम्मानित किए जा रहे हैं, उसी बीच छत्तीसगढ़ के कांकेर से गुरु के संघर्ष की ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करती है। जिले के दुर्गम इलाकों में कई शिक्षक हर दिन तेज बहाव वाली नदी पार कर और जंगल-कच्चे रास्तों से कई किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल पहुंचते हैं। कई बार यह सफर उनकी जान पर भी भारी पड़ चुका है, लेकिन बच्चों की पढ़ाई के लिए उन्होंने अपने कदम नहीं रोके।
Kanker News: नदी पार कर स्कूल पहुंचते हैं शिक्षक
उत्तर बस्तर कांकेर के अंदरूनी इलाके आज भी सड़क और पुल जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं। ग्राम संगम के बारकोट क्षेत्र में मेढकी नदी पर पुल नहीं होने के कारण नदी के दूसरी ओर बसे बारकोट, हिदुर और खेड़ेगांव के ग्रामीणों को नाव का सहारा लेना पड़ता है। करीब पांच शिक्षक भी इसी नाव से रोज नदी पार कर स्कूल पहुंचते हैं।
मुश्किल सिर्फ नदी पार करने तक सीमित नहीं है। शिक्षकों के पास नाव में सफर के दौरान लाइफ जैकेट तक उपलब्ध नहीं होती। कई बार उन्हें खुद चप्पू चलाकर तेज बहाव के बीच नदी पार करनी पड़ती है। ऐसे में मौसम खराब होने या जलस्तर बढ़ने पर खतरा और बढ़ जाता है।
Kanker News: नदी के बाद जंगल और 6 KM का पैदल सफर
नदी पार करने के बाद भी शिक्षकों की मंजिल तुरंत नहीं आती। इसके बाद उन्हें जंगल और कच्चे रास्तों से होकर पैदल चलना पड़ता है। किसी शिक्षक को करीब एक किलोमीटर तो किसी को छह किलोमीटर तक पैदल सफर करना पड़ता है। बारिश के मौसम में यही रास्ते कीचड़ और फिसलन से भर जाते हैं।
शिक्षकों का कहना है कि नदी पार करते समय डर जरूर लगता है, लेकिन बच्चों की पढ़ाई और अपनी जिम्मेदारी के चलते वे पीछे नहीं हटते। कुछ शिक्षक तो इस दुर्गम क्षेत्र में पिछले 20 वर्षों से भी ज्यादा समय से अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

एक बार पलट चुकी है नाव, तैरकर बचाई थी जान
एक शिक्षक ने बताया कि तेज बहाव के दौरान एक बार नाव नदी में पलट गई थी। उस समय उन्हें तैरकर अपनी जान बचानी पड़ी। इसके बावजूद स्कूल तक पहुंचने का सिलसिला नहीं रुका। ग्रामीणों ने आपसी सहयोग से चंदा जुटाकर नाव तैयार की है। फिलहाल यही नाव शिक्षकों और ग्रामीणों के लिए नदी पार करने का प्रमुख साधन बनी हुई है।
Kanker News: शिक्षकों की मांग- नदी पर बने पुल
ग्रामीणों और शिक्षकों की सबसे बड़ी मांग मेढकी नदी पर पुल निर्माण की है। उनका कहना है कि पुल बनने से सिर्फ शिक्षकों का सफर आसान नहीं होगा, बल्कि बारकोट, हिदुर और खेड़ेगांव के ग्रामीणों को भी बड़ी राहत मिलेगी। खासकर बारिश के दिनों में नदी का जलस्तर बढ़ने पर जान जोखिम में डालकर आवागमन करने की मजबूरी खत्म हो सकेगी। बताया जा रहा है कि कांकेर जिले के अलग-अलग दुर्गम इलाकों में करीब 32 शिक्षक ऐसे हैं, जिन्हें स्कूल पहुंचने के लिए नदी-नालों और कठिन रास्तों से गुजरना पड़ता है।
कलेक्टर ने भी माना शिक्षकों का समर्पण
शिक्षकों के इस संघर्ष और समर्पण को प्रशासन ने भी सराहा है। कलेक्टर ने दुर्गम क्षेत्रों में बच्चों तक शिक्षा पहुंचाने वाले शिक्षकों के प्रयासों को सराहनीय बताते हुए ग्रामीणों और शिक्षकों की समस्याओं के समाधान के लिए जरूरी प्रयास करने की बात कही है।
शिक्षक दिवस पर कांकेर से बड़ा संदेश
कांकेर की यह तस्वीर सिर्फ शिक्षकों के संघर्ष की कहानी नहीं है, बल्कि उन इलाकों की हकीकत भी सामने लाती है जहां आज भी बुनियादी सुविधाओं की कमी के बीच शिक्षा का दीप जल रहा है। तेज बहाव वाली नदी, बिना लाइफ जैकेट का सफर, जंगलों के बीच कई किलोमीटर की पैदल यात्रा और बारिश में कीचड़ भरे रास्ते, इन सबके बावजूद शिक्षक बच्चों के भविष्य के लिए स्कूल पहुंच रहे हैं। शिक्षक दिवस पर कांकेर के इन गुरुजनों का यह समर्पण बताता है कि कई बार एक शिक्षक सिर्फ पाठ नहीं पढ़ाता, बल्कि खुद संघर्षों से गुजरकर बच्चों के भविष्य की राह तैयार करता है।
