Assam Flood 2026: असम में आई भीषण बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार अब तक 68 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि करीब साढ़े सात लाख लोग बाढ़ से प्रभावित बताए जा रहे हैं। हजारों घर पानी में डूब गए, फसलें बर्बाद हो गईं और बड़ी संख्या में मवेशी भी बाढ़ की चपेट में आए हैं। हालांकि, सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह तबाही सिर्फ भारी बारिश की वजह से हुई या वर्षों से चली आ रही कमजोर तैयारियों ने संकट को और गंभीर बना दिया?
हजारों लोगों तक नहीं पहुंच सकी राहत
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा के अनुसार, बाढ़ के शुरुआती दिनों में करीब 80 हजार लोगों तक राहत और बचाव दल नहीं पहुंच सके थे। कई इलाकों में सड़क संपर्क टूट गया और गांव पूरी तरह पानी से घिर गए। स्थानीय लोगों का कहना है कि कुछ जगहों पर पानी इतनी तेजी से बढ़ा कि परिवारों को घर छोड़ने के लिए केवल 10 से 15 मिनट का समय मिला।

शिवसागर, चराईदेव और आसपास के जिलों में हालात सबसे अधिक गंभीर रहे। अकेले शिवसागर में लाखों लोग बाढ़ से प्रभावित हुए, जबकि हजारों हेक्टेयर फसल पानी में डूब गई। राहत शिविरों में बड़ी संख्या में बच्चे, गर्भवती महिलाएं और बुजुर्ग रह रहे हैं।
Assam Flood Crisis: एक परिवार के चार लोगों की मौत
चराईदेव के लकवा अभयपुरी गांव में एक परिवार के चार सदस्यों की तेज बहाव में बहने से मौत हो गई। परिवार का आरोप है कि मदद के लिए सरकारी हेल्पलाइन पर कॉल किया गया, लेकिन समय पर सहायता नहीं मिल सकी। हालांकि, इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। स्थानीय लोगों ने मामले की जांच और राहत व्यवस्था की समीक्षा की मांग की है।

क्लाउडबर्स्ट के दावे पर उठे सवाल
शुरुआत में राज्य सरकार की ओर से नागालैंड में बादल फटने को बाढ़ की प्रमुख वजह बताया गया था। बाद में मुख्यमंत्री ने कहा कि तकनीकी रूप से क्लाउडबर्स्ट नहीं हुआ, लेकिन बारिश की तीव्रता बादल फटने जैसी थी।
मौसम विभाग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि पूर्वोत्तर भारत में भारी बारिश असामान्य नहीं है। ऐसे में केवल बारिश को इस तबाही की पूरी वजह नहीं माना जा सकता। सवाल यह है कि जिन इलाकों में पहली बार इतनी भीषण बाढ़ आई, वहां पानी निकासी और बचाव व्यवस्था क्यों विफल रही?

कमजोर तटबंध और बंद हुए पानी के रास्ते
सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक असम में करीब 4,800 किलोमीटर लंबे तटबंध हैं, जिनमें से लगभग 3,000 किलोमीटर तटबंध कमजोर बताए गए हैं। अप्रैल से जुलाई के बीच कई स्थानों पर तटबंध टूटने की घटनाएं भी सामने आईं।
विशेषज्ञों का मानना है कि कई जगह ऊंची सड़कों और छोटी पुलियों के कारण पानी के प्राकृतिक रास्ते बंद हो गए हैं। इसके अलावा दलदली जमीन और जलग्रहण क्षेत्र लगातार कम हुए हैं। ये क्षेत्र पहले अतिरिक्त पानी को सोखने का काम करते थे, लेकिन अब पानी सीधे गांवों और खेतों में प्रवेश कर रहा है।

करोड़ों खर्च, फिर भी हर साल तबाही
असम में बाढ़ नियंत्रण परियोजनाओं पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। विधानसभा में दिए गए जवाब के अनुसार वर्ष 2023-24 में लगभग 16 किलोमीटर तटबंध से जुड़े कार्यों पर 67 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। वहीं, 2021 से 2024 के बीच सैकड़ों परियोजनाओं पर 3,400 करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च किए जाने की जानकारी सामने आई थी।
इसके बावजूद हर साल तटबंध टूटने, गांव डूबने और राहत व्यवस्था में देरी के आरोप सामने आते हैं। ऐसे में बाढ़ नियंत्रण पर खर्च हुई राशि, ठेकेदारों की भूमिका और निर्माण कार्यों की गुणवत्ता की पारदर्शी जांच की मांग तेज हो रही है।

ओडिशा मॉडल से क्या सीख सकता है असम?
आपदा प्रबंधन के मामले में ओडिशा का उदाहरण अक्सर दिया जाता है। 1999 के सुपर साइक्लोन के बाद राज्य ने पक्के आश्रय स्थल, मजबूत चेतावनी प्रणाली, स्थानीय बचाव दल और समय पर निकासी की व्यवस्था विकसित की। इसके बाद बड़े चक्रवात आने के बावजूद मौतों की संख्या में भारी कमी आई।
हालांकि असम की बाढ़ का स्वरूप अलग है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य को नए सिरे से फ्लड मैप तैयार करने, नए प्रभावित क्षेत्रों की पहचान करने और गांवों में पक्के बाढ़ आश्रय बनाने की जरूरत है।

राहत से आगे स्थायी समाधान जरूरी
असम में पानी धीरे-धीरे उतर रहा है, लेकिन संकट खत्म नहीं हुआ है। खेतों में रेत और मिट्टी की मोटी परत जमा हो गई है, जिससे आने वाले महीनों में खेती और आजीविका पर गंभीर असर पड़ सकता है।
जरूरत केवल राहत सामग्री बांटने की नहीं, बल्कि कमजोर तटबंधों की मरम्मत, प्राकृतिक जलमार्गों की बहाली, बेहतर ड्रेनेज सिस्टम, समय पर चेतावनी और खर्च की सार्वजनिक जानकारी उपलब्ध कराने की है।

असम में बाढ़ शायद हर साल आए, लेकिन बेहतर तैयारी से लोगों की जान जरूर बचाई जा सकती है। अब सवाल यही है कि क्या इस बार सरकार स्थायी समाधान की दिशा में कदम उठाएगी या फिर अगले मानसून में वही तस्वीर दोबारा दिखाई देगी?
